मतदाता सूची से EVM और SIR तक: चुनावी प्रक्रिया पर उठे सवालों के बीच जानिए Election Commission की पूरी व्यवस्था!

– DIGITAL BHILAI NEWS –

“मतदाता सूची से EVM और SIR तक… Election Commission पर लगे आरोपों का क्या है जवाब? जानिए पूरी व्यवस्था..”

  • चुनावी प्रक्रिया को लेकर सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहस में कई तरह के सवाल और आरोप सामने आते रहे हैं।
  • कभी मतदाता सूची में नाम मनमाने तरीके से जोड़ने या हटाने का आरोप लगाया जाता है, तो कभी Election Commission को “One-Man Show” बताते हुए सवाल उठाए जाते हैं।
  • EVM की विश्वसनीयता, “Vote Chori”, Model Code of Conduct यानी MCC, SIR और ECINet की सुरक्षा को लेकर भी कई दावे किए जाते हैं।
  • इन सवालों के बीच सामने आई जानकारी में हर प्रमुख आरोप के साथ उससे जुड़ी कानूनी, तकनीकी और प्रशासनिक व्यवस्था का जवाब दिया गया है।
  • आइए समझते हैं कि आरोप क्या हैं और उनके जवाब में चुनावी व्यवस्था किस तरह काम करती है। 👇

आरोप: मतदाता सूची में मनमाने तरीके से नाम जोड़ने और हटाने का आरोप?

👉आरोप लगाया जाता है कि कुछ अधिकारियों द्वारा मतदाता सूची में मनमाने ढंग से नाम जोड़ने और हटाने का काम किया जा रहा है और मतदाता सूची कुछ BJP-backed अधिकारियों के नियंत्रण में है।

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सच्चाई: मतदाता सूची तैयार करने की है कानूनी और बहु-स्तरीय प्रक्रिया है। मतदाता सूची Electoral Registration Officers यानी EROs द्वारा तैयार की जाती है। EROs Representation of the People Act, 1950 की Section 13B के तहत statutory authority हैं और quasi-judicial authority के रूप में काम करते हैं। मतदाता सूची तैयार करने में Booth Level Officers यानी BLOs की भी भूमिका होती है। इसके साथ मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त Booth Level Agents यानी BLAs भी प्रक्रिया में शामिल होते हैं। 20 लाख से अधिक Booth Level Agents इस प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जो मतदाता सूची की जांच और सत्यापन में भूमिका निभाते हैं।


आरोप: मतदाता सूची में बदलाव पर किसी का नियंत्रण नहीं?

सच्चाई: Draft Roll और ASD List की जांच होती है। मतदाता सूची तैयार होने के बाद Draft Electoral Roll और ASD List सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को दी जाती है।

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ASD का अर्थ है:

  • A – Absent
  • S – Shifted
  • D – Dead

राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त BLAs इन सूचियों की जांच करते हैं और concurrent auditors के रूप में भूमिका निभाते हैं। इस व्यवस्था में मतदाता सूची की जांच केवल सरकारी अधिकारियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की भागीदारी भी होती है।


आरोप: किसी का नाम गलत तरीके से जोड़ा या हटाया जाए तो कोई रास्ता नहीं ?

सच्चाई: Claims और Objections दाखिल करने की व्यवस्था है। कोई भी व्यक्ति या राजनीतिक दल निर्धारित प्रक्रिया के तहत Claims और Objections दाखिल कर सकता है। ERO सभी दावों और आपत्तियों की quasi-judicial प्रक्रिया के तहत सुनवाई करता है और उसके बाद निर्णय लेता है। यदि ERO के निर्णय से कोई व्यक्ति असंतुष्ट है, तो Representation of the People Act, 1950 की Section 24 के तहत पहले District Magistrate और फिर Chief Electoral Officer के पास अपील की जा सकती है। यानी मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया में दावा, आपत्ति, सुनवाई और अपील—चारों स्तरों की व्यवस्था मौजूद है।


आरोप: SIR में छूटे लोगों का नाम वापस नहीं जुड़ सकता

सच्चाई: Form 6 के जरिए नाम जोड़ने की व्यवस्था –SIR यानी Special Intensive Revision के दौरान छूट गए लोग और नए पात्र मतदाता Form 6 के जरिए अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा सकते हैं। मतदाता सूची को एक सतत यानी continuous process के रूप में अपडेट किया जाता है।


आरोप: Election Commission एक “One-Man Show” है

👉आरोप लगाया जाता है कि Election Commission में सारी शक्तियां केवल Chief Election Commissioner यानी CEC के पास हैं और बाकी दोनों Election Commissioners की भूमिका केवल औपचारिक है।

सच्चाई: Election Commission एक Multi-Member Body है। Election Commission एक multi-member body है, जिसमें: एक Chief Election Commissioner (CEC), दो Other Election Commissioners (ECs) होते हैं। यानी Election Commission में तीन Commissioners की व्यवस्था है।


आरोप: CEC अकेले फैसले लेते हैं

👉सच्चाई: तीनों Commissioners की सर्वसम्मति से निर्णय लेने की व्यवस्था है। Election Commission का कामकाज Chief Election Commissioner और दो Other Election Commissioners द्वारा सर्वसम्मति से किया जाता है। किसी एक व्यक्ति द्वारा एकतरफा निर्णय लेने की व्यवस्था नहीं है। Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 के तहत Election Commission के multi-member body के रूप में काम करने की व्यवस्था है।


आरोप: Election Commission के Press Notes में भी एक व्यक्ति का नियंत्रण है

👉सच्चाई: तीनों Commissioners की सर्वसम्मति से जारी हुए Press Notes –  Election Commission ने अपने Press Notes के जरिए इस बात को दो बार दोहराया है कि ये Press Notes तीनों Commissioners द्वारा सर्वसम्मति से जारी किए गए थे। इस आधार पर “One-Man Show” वाले आरोप का जवाब यह दिया गया है कि Election Commission को केवल एक व्यक्ति द्वारा संचालित संस्था के रूप में देखना सही नहीं है।


आरोप: Election Commission पक्षपात करता है और “Vote Chori” में भूमिका है

👉चुनावों में पक्षपात, “Vote Chori” और Model Code of Conduct यानी MCC के selective enforcement जैसे आरोप लगाए जाते हैं।

सच्चाई: चुनाव आयोग संवैधानिक व्यवस्था के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम करता है –  भारतीय संविधान के Article 324 के तहत चुनावों का superintendence, direction और control Election Commission of India के पास है।  Election Commission सरकार और किसी भी राजनीतिक दल से स्वतंत्र होकर काम करता है। हर निर्णय कानून, नियमों और स्थापित प्रक्रियाओं के तहत लिया जाता है। मतदाता सूची बनाने, मतदान और चुनावी प्रक्रिया के हर चरण में चुनाव कानूनों के तहत अधिकृत अधिकारियों द्वारा statutory procedures लागू की जाती हैं।


आरोप: “Vote Chori” एक कानूनी अपराध की श्रेणी है

👉सच्चाई: “Vote Chori” शब्द का कोई कानूनी आधार नहीं। “Vote Chori” शब्द का कोई तथ्यात्मक या कानूनी आधार नहीं है। यह एक राजनीतिक शब्द है, जिसका इस्तेमाल राजनीतिक narrative गढ़ने के लिए किया जाता है। किसी वास्तविक चुनावी अनियमितता की शिकायत के लिए निर्धारित कानूनी और शिकायत निवारण प्रक्रिया मौजूद है।


आरोप: राजनीतिक दलों के पास चुनावी प्रक्रिया की निगरानी का कोई अधिकार नहीं

👉सच्चाई: 20 लाख से अधिक BLAs की भागीदारी – राजनीतिक दलों के 20 लाख से अधिक Booth Level Agents यानी BLAs चुनावी प्रक्रिया में शामिल होते हैं और audit की प्रक्रिया में भूमिका निभाते हैं। इससे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की चुनावी प्रक्रिया में निगरानी और भागीदारी सुनिश्चित होती है।


आरोप: मतदान केंद्रों पर पारदर्शिता नहीं है

👉सच्चाई: 100% Webcasting की व्यवस्था – पूरी मतदान प्रक्रिया को उम्मीदवारों के polling agents द्वारा audit किया जाता है और सभी मतदान केंद्रों की 100% webcasting की जाती है। इस व्यवस्था से मतदान प्रक्रिया की निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है।


आरोप: MCC का इस्तेमाल चुनिंदा राजनीतिक दलों के खिलाफ किया जाता है

👉सच्चाई: MCC सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होता है –  Model Code of Conduct यानी MCC सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होता है। cVIGIL पर मिलने वाली शिकायतों सहित सभी शिकायतों पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाती है। इसके अलावा cVIGIL, जिला स्तर, राज्य स्तर और अन्य स्तरों पर शिकायत निवारण की व्यवस्था मौजूद है। शिकायत मिलने पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की जाती है।


आरोप: EVM में छेड़छाड़ हो सकती है और यह Network से जुड़ी है

👉सच्चाई: EVM एक Standalone Machine है –  EVM एक standalone यानी स्वतंत्र मशीन है। यह किसी भी network से जुड़ी नहीं होती। EVM Internet या Bluetooth से connected नहीं होती, इसलिए remote hacking संभव नहीं है। EVM की कई स्तरों पर जांच होती है और पूरी प्रक्रिया कानूनी एवं पारदर्शी तरीके से की जाती है।


आरोप: EVM की जांच चुनाव से पहले नहीं होती

👉सच्चाई: First Level Checking यानी FLC होती है –  EVM की First Level Checking यानी FLC राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में की जाती है। इस दौरान मशीन की:

  • Seal
  • Battery
  • Software
  • Functionality की जांच होती है।

आरोप: राजनीतिक दल पहले से जान सकते हैं कि कौन-सी EVM कहां जाएगी

👉सच्चाई: EVM की दो बार Randomisation होती है –  EVM की दो बार randomisation की जाती है। पहली बार District Level पर और दूसरी बार Assembly Constituency Level पर। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की मौजूदगी में EVM का allocation random तरीके से हो और पहले से यह तय न हो कि कौन-सी मशीन किस polling station पर जाएगी।


आरोप: मतदान शुरू होने से पहले EVM की कार्यक्षमता की जांच नहीं होती

👉सच्चाई: Mock Poll कराया जाता है –  वास्तविक मतदान शुरू होने से पहले उम्मीदवारों और उनके agents की मौजूदगी में Mock Poll कराया जाता है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि मशीन सही तरीके से काम कर रही है।


आरोप: EVM के वोट का कोई स्वतंत्र मिलान नहीं होता

👉सच्चाई: VVPAT से मिलान किया जाता है – हर विधानसभा क्षेत्र में randomly चुने गए 5 मतदान केंद्रों पर VVPAT slips का EVM count से मिलान किया जाता है। यह प्रक्रिया सभी पार्टी प्रतिनिधियों की मौजूदगी में की जाती है।


आरोप: EVM की विश्वसनीयता की कभी न्यायिक जांच नहीं हुई

👉सच्चाई: सुप्रीम कोर्ट कई बार EVM की जांच कर चुका है –  सुप्रीम कोर्ट ने EVM की कई बार जांच की है और उनकी विश्वसनीयता को बरकरार रखा है। सबसे हाल का मामला Association for Democratic Reforms vs ECI, April 2024 में हुआ।


आरोप: EVM के Software में छेड़छाड़ की जांच संभव नहीं!

👉सच्चाई: Burnt Memory Verification का Mechanism –  उम्मीदवारों के पास EVM की burnt memory verification की मांग करने का mechanism उपलब्ध है। इसके जरिए यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि software में कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है।


आरोप: SIR की कोई संवैधानिक और कानूनी आधार नहीं है

👉SIR यानी Special Intensive Revision को लेकर इसकी संवैधानिकता और कानूनी वैधता पर गंभीर सवाल उठाए जाते हैं।

सच्चाई: SIR के लिए Article 324 और RP Act का आधार –  बिहार में SIR के साथ Phase 2 में 12 राज्यों और Phase 3 में 19 राज्यों में SIR के आदेश तीनों Election Commissioners द्वारा सर्वसम्मति से जारी किए गए हैं। SIR संविधान के Article 324 और Representation of the People Act, 1950 की Section 21(3) के तहत किया जाता है। Section 21(3) Election Commission को किसी भी समय special revision का निर्देश देने का अधिकार देता है।


आरोप: बिहार में SIR की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी

👉सच्चाई: सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधता बरकरार रखी – 26 मई 2026 के अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR की वैधता को बरकरार रखा। हालांकि SIR की संवैधानिकता और कानूनी वैधता पर विभिन्न पक्षों द्वारा सवाल उठाए जा रहे हैं और इस पर कानूनी तथा राजनीतिक बहस जारी है।


आरोप: Cabinet Secretary का पत्र केवल Deputation का मामला नहीं, IT Division पर भी प्रभाव पड़ा

👉Cabinet Secretary के नाम से लिखे गए एक पत्र को लेकर आरोप लगाया गया कि यह केवल एक अधिकारी की deputation का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे IT Division की भूमिका और ECINet की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा छिपा है।

👉सच्चाई: यह एक प्रशासनिक मामला था – जिस पत्र का उल्लेख किया जा रहा है, वह केवल deputation पर तैनात एक अधिकारी की service से जुड़ा प्रशासनिक विषय था। Election Commission द्वारा आदेश के बाद इस मामले की निगरानी की गई और आवश्यक clarification जारी किया गया।


आरोप: IT Division पर नीति आधारित हस्तक्षेप हुआ

👉सच्चाई: IT Division पर कोई नीति आधारित हस्तक्षेप नहीं हुआ –  Election Commission या IT Division की किसी policy में कोई नीति-गत हस्तक्षेप नहीं हुआ। ECINet के विकास, रखरखाव, data security और तकनीकी संचालन की जिम्मेदारी IT Division के पास है। यह चुनावी प्रक्रिया को सुरक्षित, सुचारु और पारदर्शी बनाने में महत्वपूर्ण तकनीकी भूमिका निभाता है।


आरोप: ECINet में पर्याप्त Security Safeguards नहीं हैं

👉सच्चाई: ECINet में मजबूत Security व्यवस्था है

ECINet में मजबूत data-security protocols, audit controls और statutory safeguards लागू हैं। इनमें:

  • Access Controls
  • Audit Logs
  • Role-based Access
  • Data Security
  • Monitoring जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। इनका उद्देश्य किसी भी प्रकार के अनधिकृत हस्तक्षेप को रोकना और ECINet की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

पूरी तस्वीर: आरोपों से आगे चुनावी व्यवस्था को समझना जरूरी

👉मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने से लेकर EVM, SIR और ECINet तक चुनावी प्रक्रिया कई स्तरों पर काम करती है। इसमें ERO, BLO और BLA की भूमिका, Draft Electoral Roll, ASD List, Claims & Objections, अपील की व्यवस्था, EVM की FLC, दो चरणों में randomisation, Mock Poll, VVPAT verification, MCC, cVIGIL, SIR और ECINet की security व्यवस्था शामिल है।

यानी चुनावी प्रक्रिया केवल मतदान के दिन EVM का button दबाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे कानून, नियम, अधिकारी, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, तकनीकी व्यवस्था, शिकायत निवारण और निगरानी की कई परतें काम करती हैं।


निष्कर्ष: आरोप सुनिए, लेकिन सच्चाई भी जानिए

👉लोकतंत्र में सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन सवाल के साथ उसका जवाब और वास्तविक व्यवस्था जानना भी उतना ही जरूरी है। मतदाता सूची में मनमाने बदलाव से लेकर “One-Man Show”, “Vote Chori”, EVM tampering, MCC के selective enforcement, SIR की संवैधानिकता और ECINet की सुरक्षा तक लगाए गए आरोपों के जवाब में कानूनी, प्रशासनिक, तकनीकी और निगरानी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इसलिए चुनावी प्रक्रिया को लेकर किसी भी दावे को समझने से पहले आरोप क्या है और उसके जवाब में व्यवस्था क्या कहती है, यह जानना जरूरी है। जागरूक मतदाता वही है जो केवल आरोप नहीं सुनता, बल्कि उसके जवाब में मौजूद पूरी चुनावी व्यवस्था को भी समझता है।


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रिपोर्ट : डिजिटल भिलाई न्यूज

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