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छत्तीसगढ़ के जंगलों में मिला औषधीय खजाना! 100 से अधिक दुर्लभ जड़ी-बूटियों की पहचान, जानिए विज्ञान सभा की अनूठी पहल

– DIGITAL BHILAI NEWS –

“पारंपरिक वैद्यकीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का अद्भुत संगम, तीन राज्यों के 65 से अधिक प्रतिभागियों ने तीन दिन तक जंगलों में की औषधीय पौधों की खोज..”

  • छत्तीसगढ़ के जंगल केवल प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध पारंपरिक औषधीय विरासत के लिए भी खास पहचान रखते हैं।
  • इसी विरासत को खोजने, समझने और संरक्षित करने की दिशा में छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा की एक अनूठी पहल सामने आई है।
  • महासमुंद जिले के भोथा, टेंगराही और हाथीबाहरा के जंगलों में आयोजित तीन दिवसीय खोज यात्रा के दौरान सौ से अधिक औषधीय पौधों की पहचान की गई।
  • इस अभियान में छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और राजस्थान से आए वैद्यों, वैज्ञानिकों, आयुर्वेद चिकित्सकों, विद्यार्थियों और ग्रामीणों ने भाग लिया।
  • आइए विस्तार से जानते हैं 👇

जंगलों में खोजी गईं 100 से अधिक दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियाँ

👉छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा की पहल पर महासमुंद जिले के भोथा, टेंगराही और हाथीबाहरा के जंगलों में तीन दिवसीय औषधीय पौधों की खोज यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न हुई। 23 से 25 अक्टूबर तक चली इस यात्रा में छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और राजस्थान से आए 65 से अधिक वैद्यों, वनस्पति वैज्ञानिकों, आयुर्वेद चिकित्सकों, कृषि वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों, ग्रामीणों और विज्ञान कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। इनमें दुर्ग-भिलाई से विज्ञान सभा के सदस्य बड़ी संख्या में शामिल थे।

👉इस दौरान अमलतास, गुड सुखरी, शतावर, सफेद मूसली, काली मूसली, द्रोणपुष्पी, भालू ककई, छोटा गोखरू, खड़हार-सरिवान, कृष्णशारिवा, नागबला, मरोड़ फली, बला-अतिबला, रोहिणा हसिया, डाफर, भीरहा, बेहड़ा, आंवला, सलेहा, इंद्रायण, कुल्लू, गलगला, सालपर्णी, कृष्णपर्णी, हलदु, कस्तूरी भिंडी, जलजमनी, कुटज और सफेद भूलन सहित सौ से अधिक दुर्लभ औषधीय पौधों की पहचान की गई।

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सदस्यों ने साझा की अपने-अपने क्षेत्र के औषधीय पौधों की जानकारी

👉विज्ञान सभा की इस 30वीं खोज यात्रा के पहले दिन उद्घाटन सत्र में विभिन्न राज्यों से आए परंपरागत वैद्यकीय प्रेमियों ने अपने-अपने क्षेत्रों के वन संसाधनों और उपलब्ध औषधीय पौधों की जानकारी साझा की। इस पूरी खोज यात्रा के नेतृत्वकर्ताओं में छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा के अध्यक्ष एवं रिटायर्ड अपर कलेक्टर विश्वास मेश्राम, अंचल के प्रसिद्ध टैक्सनॉमिस्ट दिनेश कुमार, विज्ञान सभा के ज्वाइंट सेक्रेटरी रतन गोंडाने, कोषाध्यक्ष एवं शिक्षाविद् अंजू मेश्राम, ग्राम हाथीबाहरा के वैद्य चमार राय नेताम, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुरूद के जूलॉजिस्ट डॉ. एच.एन. टंडन, इतिहासकार और कसेकेरा मिडिल स्कूल के प्रधान अध्यापक डॉ. विजय शर्मा, आयुर्वेदिक कॉलेज बिलासपुर के प्रोफेसर विवेक दुबे, कोरबा से आए वैद्य अर्जुन लाल श्रीवास, राजस्थान से आए वैद्य महेंद्र कुमार सैनी, महाराष्ट्र से आए युवा विज्ञान कार्यकर्ता व सिविल इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स रुचिका मेढ़ें तथा नोएल गेडाम शामिल रहे।


जंगल में सदस्यों ने की रिसोर्स मैपिंग, आदिवासियों ने बताई औषधियों की महत्ता

👉कार्यक्रम के दूसरे दिन सुबह से शाम तक भोथा, टेंगराही और हाथीबाहरा के सघन जंगलों में औषधीय पौधों की खोज और रिसोर्स मैपिंग का कार्य किया गया। इस दौरान ग्राम भोथा के युवा विज्ञान कार्यकर्ता गीतेश साहू, वरिष्ठ इंजीनियर लक्ष्मीकांत अग्रवाल, हाथीबाहरा मिडिल स्कूल के प्रधानाध्यापक खेमचंद चक्रधारी, टोंगोपानी स्कूल के शिक्षक विजय जगत, बॉटनिस्ट सर्वेश कौशिक, जगदलपुर (बस्तर) से आईं प्राध्यापक मनीषा टाइगर, गरियाबंद की मनीषा टेकाम, ग्राम टेंगराही के जनपद सदस्य तुलाराम ठाकुर और वैद्य अमर सिंह ठाकुर ने सक्रिय योगदान दिया। जड़ी-बूटियाँ खोजते समय जंगल में मिले स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि वे सब मिलकर इन जंगलों, जड़ी-बूटियों और वन्य जीवों की तस्करों से रक्षा करते हैं तथा बाहरी लोगों द्वारा लकड़ी काटने या शिकार करने पर पूरी पाबंदी है।


औषधियों का दस्तावेजीकरण और परंपरा का किया सम्मान

👉यात्रा के तीसरे दिन वैद्यों और वनस्पतिविदों ने खोजी गई औषधियों के गुणधर्मों और उपयोग पर विस्तार से चर्चा कर उसका दस्तावेजीकरण किया, जिसे विज्ञान सभा द्वारा एक पुस्तिका के रूप में संकलित कर शोध कार्यों के लिए रेफरेंस सामग्री बनाया जाएगा। समापन अवसर पर वैद्यराज चमार राय नेताम, वैद्य संत कुमार तथा वैद्य तुला राम नेताम को शाल एवं पौधा भेंट कर सम्मानित किया गया।

👉कोमाखान की प्रबुद्ध नागरिक अनुभा सिंह ठाकुर ने कहा कि यह यात्रा लुप्त होती पारंपरिक धरोहर को सहेजने का एक महान अभियान है। इस अवसर पर विज्ञान सभा के राज्य सचिव और पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. वाय.के. सोना ने अपने संदेश में सभी को पर्यावरण बचाने के लिए प्रेरित किया, जबकि कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. विजय कुमार शर्मा ने तथा आभार प्रदर्शन विज्ञान आश्रम कसेकेरा की संचालिका उषा मेश्राम ने किया।


तीन दशकों से जारी है विज्ञान सभा का सफर

👉समापन समारोह को संबोधित करते हुए अध्यक्ष विश्वास मेश्राम ने वर्ष 1999 में बस्तर क्षेत्र में महानदी के तट से शुरू हुई इस अनवरत यात्रा के इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह यात्रा बस्तर से शुरू होकर मध्यप्रदेश के पातालकोट, उड़ीसा के गंधमर्दन पर्वत (हरिशंकर से नरसिंहनाथ), तिरिया-माचकोट, कांगेर वैली, कुम्हानखार, मलाजकुडुम, झलियामारी, मांझीनगढ़, केशकाल, टाटामारी, डौंडीलोहारा, देवपुर, सतरेंगा, चैतुरगढ़ और अमरकंटक जैसे तमाम जंगलों, पहाड़ियों व घाटियों से होते हुए अब महासमुंद जिले के भोथा-टेंगराही-हाथीबाहरा जंगल तक पहुँची है। उन्होंने विज्ञान सभा के उद्देश्यों को साझा करते हुए लोगों से अंधविश्वास से दूर रहने का आह्वान किया। वहीं, फीडबैक देते हुए प्रतिभागियों ने इसे बेहद लाभदायक बताया और अपनी प्राचीन वन संपदा को बचाने का संकल्प लिया।


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रिपोर्ट : डिजिटल भिलाई न्यूज

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