8 एकड़ जमीन विवाद में बड़ा फैसला! चौहान हाउसिंग का दावा कोर्ट ने किया खारिज, जाने चिखली के किसानों की कानूनी लड़ाई में क्या हुआ?

– DIGITAL BHILAI NEWS –

  • छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में चिखली की करीब 8 एकड़ जमीन से जुड़े विवाद में न्यायालय ने अहम फैसला सुनाते हुए चौहान हाउसिंग कंपनी की ओर से दायर दीवानी वाद को खारिज कर दिया है।
  • यह मामला जमीन की बिक्री के कथित इकरारनामे और उसके आधार पर रजिस्ट्री कराने की मांग से जुड़ा था।
  • मामले में चिखली निवासी किसानों की ओर से भिलाई हुडको निवासी “अधिवक्ता उज्जवल पचकोड़े” ने पैरवी की।
  • यह मामला 2021 से न्यायालय में था और पांच सालों बाद इसमें फैसला 12 अक्टूबर 2026 को आया है।
  • आइए विस्तार से जानते हैं 👇

अधिवक्ता उज्जवल पचकोड़े की पैरवी से जीते चिखली के किसान

👉माननीय नवम अतिरिक्त जिला न्यायाधीश श्रीमान पंकज दीक्षित के न्यायालय ने चौहान हाउसिंग कंपनी के अजय चौहान द्वारा चिखली निवासी किसानों के खिलाफ दायर ज़मीन से जुड़े दीवानी मामले को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। मामला चिखली स्थित 8 एकड़ 2.5 डिसमिल ज़मीन का था। अजय चौहान का दावा था कि किसानों के साथ ₹18,50,000 प्रति एकड़ के भाव से सौदा तय हुआ था, जिसके आधार पर उन्होंने रजिस्ट्री कराने हेतु कोर्ट में वाद प्रस्तुत किया था।

न्यायालय में चली लंबी कानूनी प्रक्रिया और गवाहों के बयानों के बाद अदालत ने वादी अजय चौहान का वाद खारिज कर दिया। इस प्रकरण में प्रतिवादी किसानों (मुकेश, कमल नारायण और टेकू राम) की ओर से दुर्ग के प्रसिद्ध अधिवक्ता श्री उज्जवल पचकोड़े ने पैरवी की। अधिवक्ता उज्जवल पचकोड़े की मजबूत दलीलों और सटीक कानूनी पैरवी के चलते किसानों को न्याय मिला और वे इस बड़ी कानूनी लड़ाई में विजयी हुए।


क्या था पूरा जमीन विवाद?

👉न्यायालय के फैसले के अनुसार, चौहान हाउसिंग कंपनी ने कथित इकरारनामे के आधार पर जमीन की रजिस्ट्री कराने के लिए वाद दायर किया था। कंपनी की ओर से जमीन का सौदा ₹18.50 लाख प्रति एकड़ की दर से तय होने का दावा किया गया था। विवाद का मुख्य प्रश्न यह था कि क्या प्रस्तुत दस्तावेज के आधार पर जमीन की बिक्री का करार साबित होता है और क्या वादी को न्यायालय से रजिस्ट्री कराने का आदेश प्राप्त करने का अधिकार है। दूसरी ओर, प्रतिवादी किसानों ने कथित इकरारनामे और जमीन बेचने के सौदे से इनकार किया था। इस तरह मामला केवल जमीन की कीमत या रजिस्ट्री तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कथित करार की विश्वसनीयता, भुगतान और कानूनी शर्तों के पालन जैसे सवाल भी न्यायालय के सामने आए।

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इकरारनामे और ₹3 लाख की रकम पर भी उठा सवाल

👉मुकदमे में ₹3 लाख की रकम का उल्लेख भी महत्वपूर्ण था। वादी की ओर से इसे जमीन के सौदे से जुड़ी अग्रिम राशि के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि प्रतिवादी पक्ष ने इस रकम को विवादित जमीन के सौदे का भुगतान मानने से इनकार किया। न्यायालय ने दस्तावेजों और साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए पाया कि वादी कथित इकरारनामे तथा ₹3 लाख की राशि को इसी जमीन की बिक्री के करार से जोड़कर पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर पाया। फैसले में इकरारनामे की परिस्थितियों और उसके विवरण को लेकर उठे सवालों पर भी विचार किया गया।


अदालत ने किन आधारों पर खारिज किया वाद?

👉फैसले में न्यायालय ने केवल कथित इकरारनामे के आधार पर रजिस्ट्री कराने का आदेश नहीं दिया। अदालत ने दस्तावेज की विश्वसनीयता, संबंधित पक्षों के बयानों, भुगतान से जुड़े साक्ष्यों और वादी की ओर से सौदे की शेष राशि चुकाने की तैयारी से जुड़े पहलुओं पर विचार किया।न्यायालय के निष्कर्ष के अनुसार, वादी यह साबित करने में सफल नहीं रहा कि वह अनुबंध के विशिष्ट पालन यानी Specific Performance का कानूनी अनुतोष पाने का अधिकारी है। अदालत ने यह भी माना कि वादी अपनी ओर से आवश्यक कानूनी शर्तों और दावों को पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित नहीं कर पाया।


जमीन पर कब्जे का मुद्दा भी रहा चर्चा में

👉इस मामले में जमीन के कब्जे का प्रश्न भी न्यायालय के समक्ष आया। फैसले में इस मुद्दे पर वादी के पक्ष में निष्कर्ष दर्ज किया गया, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने वादी को जमीन का मालिक घोषित कर दिया या जमीन की रजिस्ट्री कराने का आदेश दे दिया। न्यायालय ने अन्य मुद्दों पर किए गए साक्ष्य-विवेचन के आधार पर वाद खारिज कर दिया। इसलिए कब्जे से जुड़े निष्कर्ष और जमीन के स्वामित्व या रजिस्ट्री के अधिकार को अलग-अलग समझना जरूरी है।


न्यायालय ने सुनाया फैसला, वादी का वाद खारिज

👉नवम जिला न्यायाधीश, दुर्ग के न्यायालय ने 12 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाते हुए वादी का वाद खारिज कर दिया। आदेश के अनुसार, दोनों पक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे। अधिवक्ता शुल्क प्रमाणित होने पर सूची के अनुसार अथवा जो भी कम हो, देय होगा। इस फैसले से चिखली के प्रतिवादी किसानों को इस दीवानी मुकदमे में राहत मिली है।


चिखली के जमीन विवाद में फैसले की अहमियत

👉जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़े मामलों में इकरारनामा, भुगतान के प्रमाण, पक्षकारों की सहमति और अनुबंध के पालन की तैयारी जैसे पहलू महत्वपूर्ण होते हैं। इस मामले में भी न्यायालय ने उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर वादी के दावे का परीक्षण किया और उसे पर्याप्त रूप से प्रमाणित नहीं पाए जाने पर वाद खारिज कर दिया। चिखली के इस मामले में अधिवक्ता उज्जवल पचकोड़े ने प्रतिवादी किसानों की ओर से पैरवी की। अदालत का फैसला जमीन के कथित सौदे से जुड़े विवाद में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।


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रिपोर्ट : डिजिटल भिलाई न्यूज

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