NJCS सुधार विवाद : इस्पात मंत्रालय ने अपनी भूमिका से किया इंकार – पढ़िए SAIL कर्मचारियों से जुड़ा चौंका देने वाला मामला??

BAKS BHILAI NEWS

– DIGITAL BHILAI NEWS – (SAIL)


17-अगस्त-2025 – नई दिल्ली/भिलाई

  • NJCS पर इस्पात मंत्रालय ने अपनी भूमिका से किया इंकार…..❌

  • “मंत्रालय कर रहा है गुमराह” – BAKS भिलाई

  • जानिए क्या है ये चौंका 😱 देने वाला खुलासा??


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👉🏻BHILAI STEEL PLANT की मान्यता प्राप्त यूनियन BSP अनधिशासी कर्मचारी संघ (BAKS) और इस्पात मंत्रालय के बीच चल रहे National Joint Committee for Steel Industry (NJCS) सुधार विवाद ने नया मोड़ ले लिया है।

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👉🏻दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल मामले के दौरान मंत्रालय द्वारा दिए गए हालिया जवाब ने न केवल कर्मचारियों को चौंका दिया है बल्कि NJCS की कानूनी वैधता और इसके जरिए हुए दशकों पुराने समझौतों पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।


मंत्रालय का ताज़ा रुख⚡

👉🏻8 अगस्त 2025 को इस्पात मंत्रालय (SAIL डिवीजन) ने BAKS को पत्र भेजकर बताया है कि NJCS की स्थापना और संचालन में मंत्रालय की कोई भूमिका नहीं है।

👉🏻मंत्रालय का कहना है कि NJCS का गठन 1969 में औद्योगिक समिति के निर्णय से हुआ और इसमें Dy. Chief Labour Commissioner (Central) सचिवीय भूमिका निभाता है।

👉🏻इसलिए मंत्रालय सीधे तौर पर इसके गठन और कार्यप्रणाली का जिम्मेदार नहीं है। ❌

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BAKS यूनियन का पलटवार: “मंत्रालय कर रहा गुमराह”

BAKS अध्यक्ष अमर सिंह ने मंत्रालय के जवाब को गुमराह करने वाला बताते हुए तीन बड़े सवाल खड़े किए हैं—

  • 1. अगर इस्पात मंत्रालय का कोई रोल नहीं था, तो फरवरी 1971 में तत्कालीन इस्पात मंत्री कुमार मंगलम ने NJCS को ट्राईपार्टी से बाइपार्टी कमेटी बनाने का निर्णय किस हैसियत से लिया?
  • 2. उस समय क्या श्रम मंत्रालय से कोई आधिकारिक सहमति ली गई थी?
  • 3. यदि NJCS बिना किसी कानून के गठित था, तो मंत्रालय ने अब तक NJCS के समझौतों को किस आधार पर मंजूरी दी?

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बैकग्राउंड: NJCS और विवाद का इतिहास👉🏻

1969: औद्योगिक समिति के निर्णय के आधार पर NJCS (erstwhile JWNC) का गठन।

1971: तत्कालीन इस्पात मंत्री के फैसले से NJCS को ट्राईपार्टी से बाइपार्टी समिति बनाया गया।

पिछले 50 साल: NJCS ने SAIL और RINL जैसे सार्वजनिक उपक्रमों के non-executive कर्मचारियों के लिए वेतन समझौते किए, जिन्हें मंत्रालय ने मंजूरी भी दी।

2023-24: BAKS ने NJCS में “नॉमिनेटेड नेताओं” की सदस्यता पर रोक लगाने की मांग की और इस पर दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

04 दिसम्बर 2024: हाई कोर्ट ने मंत्रालय को तीन माह में फैसला लेने का निर्देश दिया।

08 अगस्त 2025: मंत्रालय ने NJCS में अपनी भूमिका से इनकार करते हुए representations “disposed of” कर दी।


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अदालत और भविष्य की दिशा👉🏻

अब जबकि मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में विचाराधीन है, मंत्रालय के इस रुख से अदालत को भी स्पष्ट गाइडलाइन तय करने का अवसर मिलेगा। यूनियन का कहना है कि यदि NJCS का गठन मंत्रालय की ज़िम्मेदारी नहीं थी, तो अब नए सिरे से कानूनी और पारदर्शी ढांचे के साथ इसका पुनर्गठन होना चाहिए।


यूनियन की माँगें ✅

BAKS ने NJCS सुधार के लिए चार प्रमुख माँगें रखी हैं👉🏻

  • सिर्फ निर्वाचित मान्यता प्राप्त यूनियनों को NJCS में प्रतिनिधित्व मिले।
  • हर तिमाही वित्तीय परिणाम के बाद नियमित बैठक अनिवार्य हो।
  • अध्यक्षता का बारी-बारी सिद्धांत लागू हो—पहले वर्ष यूनियन, अगले वर्ष प्रबंधन।
  • वार्षिक एजेंडा तय हो और उसका समयबद्ध अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।

विश्लेषण: क्यों अहम है यह विवाद?

👉🏻यह विवाद केवल एक यूनियन और मंत्रालय का टकराव नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि दशकों से कर्मचारियों के वेतन और सेवा शर्तों पर हुए समझौतों की कानूनी नींव कितनी मजबूत है?

👉🏻यदि अदालत NJCS को अवैध या गैर-कानूनी गठन मान लेती है, तो इससे भविष्य की वेतन वार्ताओं और पुराने समझौतों पर भी असर पड़ सकता है।

👉🏻विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मामला PSU सेक्टर की वेज पॉलिसी और श्रम कानूनों के बीच संतुलन की परीक्षा है।


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निष्कर्ष✍🏻

इस्पात मंत्रालय द्वारा NJCS में अपनी भूमिका से इनकार ने पूरे मामले को नया आयाम दे दिया है। अब निगाहें दिल्ली उच्च न्यायालय पर हैं, जहाँ से आने वाला फैसला न केवल SAIL कर्मचारियों बल्कि पूरे स्टील उद्योग के भविष्य को प्रभावित करेगा।


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✍🏻 रिपोर्ट : DIGITAL BHILAI NEWS 

 

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