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NCST के 22 साल: आदिवासी अधिकारों का संवैधानिक प्रहरी… अब भिलाई से उठी राष्ट्रीय लड़ाई

– DIGITAL BHILAI NEWS – 

  • भारत के संवैधानिक इतिहास में 19 फरवरी एक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इसी दिन वर्ष 2004 में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का गठन हुआ था।
  • यह संस्था आदिवासी समुदाय के अधिकारों, सम्मान और न्याय की रक्षा के लिए बनाई गई थी।
  • स्थापना के 22 वर्ष पूरे होने पर देशभर में इसे संवैधानिक संरक्षक के रूप में याद किया जा रहा है।
  • इसी अवसर पर भिलाई स्टील प्लांट के अनुसूचित जनजाति कर्मचारियों की संस्था ने आयोग को बधाई संदेश भेजते हुए अपने मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की घोषणा भी की है।
  • आइए विस्तार से जानते है इस विषय को 👇
NCST
BSP ST ASSOCIATION

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग: संविधान से मिला अधिकार

👉National Commission for Scheduled Tribes भारत के संविधान द्वारा स्थापित एक संवैधानिक संस्था है, जिसका उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों की रक्षा करना और उनके विकास को सुनिश्चित करना है।

👉इस आयोग की स्थापना संविधान (89वाँ संशोधन) अधिनियम, 2003 के तहत हुई। इससे पहले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए संयुक्त आयोग कार्य करता था।

👉लेकिन आदिवासी समाज की समस्याएँ — जैसे वन अधिकार, विस्थापन, सांस्कृतिक पहचान और संसाधनों पर नियंत्रण — अलग प्रकृति की थीं। इसलिए संविधान में नया अनुच्छेद 338A जोड़ा गया और अलग आयोग बनाया गया।

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👉19 फरवरी 2004 से यह संशोधन प्रभावी हुआ और NCST औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया। राष्ट्रपति द्वारा गठित यह आयोग नई दिल्ली के लोकनायक भवन में स्थित है और देशभर में इसके क्षेत्रीय कार्यालय कार्यरत हैं।


गठन का उद्देश्य: आदिवासी समाज को न्याय और संरक्षण

👉NCST का मूल उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करना और उनके अधिकारों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है

👉आयोग के प्रमुख कार्यों में शामिल हैं:

  • संविधान और कानूनों के तहत दिए गए सुरक्षा उपायों का पालन सुनिश्चित करना।
  • आदिवासी समाज के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक विकास की निगरानी करना।
  • भूमि, वन संसाधन और सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े मामलों में न्याय दिलाना।
  • सरकार को नीतिगत सुझाव देना और सुधार के लिए सिफारिशें करना।

👉संक्षेप में, NCST आदिवासी समुदाय की आवाज को नीति निर्माण तक पहुँचाने वाला संवैधानिक माध्यम है।


कार्यप्रणाली: जांच, सलाह और रिपोर्टिंग

👉अनुच्छेद 338A के तहत आयोग को व्यापक अधिकार प्राप्त हैं। यह शिकायतों की जांच करता है, स्वतः संज्ञान ले सकता है और सरकार को रिपोर्ट भेजता है।

👉इसके पास सिविल कोर्ट जैसी शक्तियाँ भी होती हैं, जैसे: गवाहों को बुलाना, दस्तावेज मंगाना, शपथ पर बयान लेना। आयोग हर वर्ष राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, जो संसद में रखी जाती है। इससे सरकार की जवाबदेही तय होती है।


22 वर्षों का सफर और आज की चुनौतियाँ!

👉पिछले दो दशकों में NCST ने हजारों मामलों में हस्तक्षेप कर आदिवासी समुदाय को न्याय दिलाने का प्रयास किया है। लेकिन चुनौतियाँ अभी भी गंभीर हैं।

👉मुख्य समस्याएँ: वन अधिकार कानून (FRA) के लंबित दावे! PESA कानून का कमजोर क्रियान्वयन! विकास परियोजनाओं से विस्थापन! अत्यंत संवेदनशील जनजातीय समूहों (PVTGs) पर खतरा!

👉विशेषज्ञ मानते हैं कि आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन संसाधनों और तेज कार्रवाई की जरूरत बनी हुई है।


भिलाई से उठी आवाज: कर्मचारियों के मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर!

👉स्थापना दिवस के अवसर पर भिलाई स्टील प्लांट शेड्यूल्ड ट्राइब एम्पलाईज वेलफेयर एसोसिएशन ने आयोग को ईमेल के माध्यम से बधाई संदेश भेजा।

NCST

👉संस्था का कहना है कि वह छत्तीसगढ़ सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1973 के तहत पंजीकृत संगठन है और लंबे समय से अनुसूचित जनजाति कर्मचारियों के अधिकारों और कल्याण के लिए काम कर रही है।

👉संस्था के अनुसार: कर्मचारियों से जुड़े कई वेलफेयर मुद्दे प्रबंधन के सामने रखे गए पर अब तक समाधान नहीं हुआ है।जल्द ही इन मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाएगा। राष्ट्रपति से लेकर NCST तक शिकायत ले जाने की तैयारी है।

👉इस कदम को कर्मचारियों के अधिकारों की लड़ाई का महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है।


✉️ स्थापना दिवस पर बधाई संदेश🤝

👉संस्था ने अपने संदेश में आयोग के 22 वर्षों के कार्य को सराहते हुए कहा कि यह आदिवासी समाज की उम्मीद और संघर्ष का प्रतीक है।

👉साथ ही देशभर के आदिवासी समुदाय को स्थापना दिवस की शुभकामनाएँ दी गईं और न्याय व अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट रहने का आह्वान किया गया।


निष्कर्ष: संवैधानिक व्यवस्था से न्याय की उम्मीद

👉22 वर्षों में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिर भी चुनौतियाँ खत्म नहीं हुईं।

👉भिलाई से उठी आवाज इस बात का संकेत है कि जब स्थानीय समस्याएँ राष्ट्रीय मंच तक पहुँचती हैं, तभी समाधान की दिशा मजबूत होती है।

👉जब तक जंगल, जमीन और जल पर आदिवासी समुदाय का अधिकार सुरक्षित नहीं होगा, तब तक विकास अधूरा रहेगा। संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती और समाज की एकजुटता ही सच्चे न्याय की राह तैयार कर सकती है


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रिपोर्ट : डिजिटल भिलाई न्यूज

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