होलाष्टक शुरू: 8 दिनों तक मांगलिक कार्यों पर विराम, जानिए परंपरा और धार्मिक महत्व

– DIGITAL BHILAI NEWS –

  • फाल्गुन माह के साथ ही होली का उत्साह तेज हो चुका है, लेकिन इसी उल्लास के बीच एक महत्वपूर्ण धार्मिक अवधि भी शुरू हो गई है।
  • 24 फरवरी से होलाष्टक प्रारंभ हो चुका है, जिसके चलते अगले आठ दिनों तक विवाह, गृह प्रवेश, सगाई और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम रहेगा।
  • 03 मार्च को होलिका दहन के साथ इस अवधि का समापन होगा।
  • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दिनों में शुभ कार्यों को टालना ही उचित माना जाता है।

क्या है होलाष्टक और क्यों माने जाते हैं ये दिन विशेष?

👉पंचांग के अनुसार फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक के आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है। इसी अवधि में होलिका दहन की तैयारी होती है और पूर्णिमा की रात अग्नि प्रज्वलित की जाती है। धार्मिक दृष्टि से यह समय आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन का माना जाता है।

👉मान्यता है कि इन आठ दिनों में ग्रहों की स्थिति स्थिर नहीं रहती और शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं मानी जाती। इसी कारण से विवाह, मुंडन, नामकरण, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य इस दौरान नहीं किए जाते। ज्योतिषीय परंपराओं में यह भी कहा जाता है कि इन दिनों में बड़े निवेश या नए कार्य की शुरुआत से बचना चाहिए।


होलिका दहन से जुड़ी पौराणिक कथा

👉होलाष्टक की पृष्ठभूमि में प्रह्लाद और होलिका की कथा जुड़ी हुई है। पौराणिक वर्णनों के अनुसार असुरराज हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति से रोकने का प्रयास किया था।

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👉जब सभी प्रयास असफल रहे, तब होलिका ने अग्नि में बैठकर प्रह्लाद को जलाने की योजना बनाई। लेकिन भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका अग्नि में भस्म हो गई।

👉इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष होलिका दहन किया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। होलाष्टक की अवधि उसी घटना से जुड़ी आध्यात्मिक तैयारी का समय मानी जाती है।


इन 8 दिनों में क्या करें और क्या न करें?

👉धार्मिक परंपराओं के अनुसार होलाष्टक में शुभ और मांगलिक कार्यों से दूरी बनाए रखनी चाहिए। विवाह की तिथि तय करना, नया घर लेना, वाहन खरीदना या बड़े व्यावसायिक निर्णय लेना इस समय टालना बेहतर माना जाता है।

👉हालांकि यह समय पूरी तरह निष्क्रिय रहने का नहीं है। इसे दान-पुण्य, जप-तप, ध्यान और पूजा के लिए श्रेष्ठ माना गया है। भगवान विष्णु की आराधना, महामृत्युंजय मंत्र का जाप और हनुमान जी की पूजा को सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत बताया जाता है। कई लोग इस अवधि में व्रत रखकर आत्मशुद्धि का प्रयास भी करते हैं।

परम्पराएं व सावधानी –

👉देशभर में होलाष्टक को लेकर गहरी लोक मान्यताएं हैं। माघ पूर्णिमा को ‘होली का डांडा’ रोपित होने के साथ ही वातावरण में बदलाव महसूस होने लगता है। परंपरा के अनुसार, विवाह की पहली होली पर नवविवाहिता को अपने ससुराल में नहीं रहना चाहिए। माना जाता है कि उसे होली की ‘आंच’ से बचाना शुभ होता है। इसलिए इन नियमों का पालन करना चाहिए


ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में तैयारियां तेज…

👉भिलाई और आसपास के क्षेत्रों में होलिका दहन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। मोहल्लों और गांवों में लकड़ी एकत्रित की जा रही है और पारंपरिक रीति से होलिका सजाई जा रही है। बच्चों और युवाओं में रंगों और पिचकारियों को लेकर उत्साह देखा जा रहा है।

👉धार्मिक मान्यताओं के बावजूद सामाजिक स्तर पर यह समय सामूहिक तैयारी और मेलजोल का भी होता है। लोग आपसी मतभेद भूलकर होली के पर्व की तैयारी में जुट जाते हैं। होलाष्टक का पालन करते हुए भी उत्सव की उमंग कम नहीं होती।


समाज और परिवार पर प्रभाव

👉मांगलिक कार्यों पर अस्थायी रोक से विवाह और अन्य कार्यक्रमों की तिथियों में बदलाव देखने को मिलता है। कई परिवार इस अवधि के बाद शुभ मुहूर्त का इंतजार करते हैं। स्थानीय पंडितों और ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी लोग इसका पालन करते हैं।

👉धार्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो होलाष्टक व्यक्ति को संयम और आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित करता है। यह समय उत्सव से पहले आत्ममंथन का अवसर भी प्रदान करता है।


03 मार्च को होगा समापन

👉होलाष्टक का समापन 03 मार्च को होलिका दहन के साथ होगा। इसके अगले दिन रंगों की होली मनाई जाएगी। मान्यता है कि होलिका दहन की अग्नि में नकारात्मकता का दहन होता है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है।

👉इस प्रकार, होलाष्टक केवल प्रतिबंधों की अवधि नहीं बल्कि धार्मिक आस्था, संयम और सकारात्मक बदलाव का प्रतीक भी है। भिलाई सहित पूरे प्रदेश में लोग परंपरा का पालन करते हुए होली के पर्व की तैयारी में जुटे हुए हैं।


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रिपोर्ट: डिजिटल भिलाई न्यूज 

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